सहरसा का अतलखा मेला: मिट्टी के खिलौने, झिलिया मुरही और बड़गांव से नाव पर जाने की यादें Atalkha Mela Saharsa: Traditional Clay Toys, Jhiliya Murhi and Memories of Bargaon
मिट्टी के खिलौनों से पहचाना जाता था अतलखा मेला
अतलखा मेला (Atalkha Fair) कभी स्थानीय कुम्हार समाज के हुनर और मिट्टी के खिलौनों के लिए जाना जाता था। यहां कुम्हार समाज के लोग तरह-तरह के खिलौने बनाते थे। मेले में आने वाले लोग इन खिलौनों को देखते और खरीदते थे। मिट्टी से बनी ये चीजें स्थानीय कारीगरी की पहचान थीं।
मेले में कुम्हारों की मौजूदगी ग्रामीण जीवन और पारंपरिक हुनर की तस्वीर पेश करती थी। खिलौनों की बिक्री से स्थानीय कारीगरों को अपने बनाए सामान को लोगों तक पहुंचाने का अवसर मिलता था।
झिलिया मुरही और जलेबी की रहती थी मांग
अतलखा मेले की पुरानी पहचान में खानपान का भी खास स्थान था। झिलिया मुरही (Jhiliya Murhi) और जलेबी की खूब बिक्री होती थी। मेले में घूमने आने वाले लोगों के लिए ये स्थानीय पसंद का हिस्सा थीं। खिलौनों की दुकानें और खाने-पीने की चहल-पहल मेले को अलग माहौल देती थीं।
मिट्टी के खिलौने, झिलिया मुरही और जलेबी—इन चीजों का जिक्र आज भी अतलखा मेले की पुरानी यादों के साथ किया जाता है।
जब बड़गांव के लोग नाव से पार कर जाते थे मेला
बड़गांव (Bargaon) के लोगों के लिए अतलखा मेले तक नाव से पार कर जाना पुरानी यादों का एक खास हिस्सा रहा है। उस दौर में नाव से पार जाना मेले तक पहुंचने के सफर का हिस्सा हुआ करता था। बुजुर्ग उस समय के दृश्य को आज भी याद करते हैं।
समय के साथ आवागमन की व्यवस्था बदली और पुल का निर्माण हो गया। अब लोगों के लिए रास्ता आसान हो गया है। नाव से पार कर मेले तक जाने का पुराना दृश्य बीते समय की याद बन चुका है।
बड़गांव, बुआरी, नोनैती और मंगवार-बरेठ के लोग भी पहुंचते थे
अतलखा मेला आसपास के कई गांवों के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र था। बड़गांव, बुआरी, नोनैती और मंगवार-बरेठ सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग मेले में आते थे। इस जुटान से मेले में खरीदारी और आपसी मेलजोल का माहौल बनता था।
ग्रामीण इलाकों में ऐसे आयोजन लोगों को एक जगह मिलने और स्थानीय सामान खरीदने का अवसर देते रहे हैं। अतलखा मेले की पहचान भी आसपास के गांवों से जुड़ी इसी परंपरा से बनी।
स्वर्गीय हीरा बाबू लगवाते थे मेला, बाद में ग्रामीणों को मिली जिम्मेदारी
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, अतलखा-बड़गांव के जमींदार स्वर्गीय हीरा बाबू के द्वारा मेले का आयोजन कराया जाता था। कुछ साल पहले मेले की जिम्मेदारी स्थानीय ग्रामीणों को सौंप दी गई।
मेले के आयोजन से जुड़ी यह जानकारी स्थानीय बुजुर्गों की बताई यादों और अनुभवों पर आधारित है। मेले के पुराने स्वरूप और उससे जुड़ी परंपराओं का जिक्र आज भी क्षेत्र के लोगों के बीच होता है।
बदलते समय के बीच पुरानी यादों में जिंदा है अतलखा मेला
मिट्टी के खिलौने बनाने वाले कारीगर, झिलिया मुरही और जलेबी की दुकानें, आसपास के गांवों से आने वाले लोग और बड़गांव से नाव द्वारा पार करने का दृश्य—ये सभी अतलखा मेले की पुरानी पहचान से जुड़े हैं।
पुल बनने से आवागमन आसान हुआ है और समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला है। लेकिन जिन्होंने पुराने दिनों का मेला देखा है, उनके लिए नाव से जाने का सफर और मिट्टी के खिलौनों की दुकानें आज भी यादों का हिस्सा हैं।
अतलखा मेले की कहानी स्थानीय कारीगरी, झिलिया मुरही और जलेबी के स्वाद तथा बड़गांव से नाव द्वारा मेले तक पहुंचने की पुरानी परंपरा से जुड़ी है। यही यादें इस मेले को क्षेत्र के लोगों के लिए खास बनाती हैं।
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