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चंद्रा टाइम्स

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दरभंगा एम्स के निर्माण में देरी पर सामूहिक उपवास, जल्द काम शुरू कराने की उठी मांग

 

Chandra Times Desk / Darbhanga

दरभंगा, 02 अक्टूबर। महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के मौके पर गुरुवार को दरभंगा में स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी एक पुरानी मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ा। दरभंगा एम्स के निर्माण कार्य को शीघ्र शुरू कराने की मांग को लेकर ‘दरभंगा एम्स बनाओ अभियान’ और नागरिक समाज, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में लहेरियासराय स्थित पोलो मैदान के धरना स्थल पर एक दिवसीय सामूहिक उपवास का आयोजन किया गया। गांधी जयंती के दिन आयोजित इस कार्यक्रम के जरिए आंदोलनकारियों ने सरकार का ध्यान इस बात की ओर खींचने की कोशिश की कि वर्षों से प्रस्तावित इस बड़े स्वास्थ्य संस्थान का निर्माण अब और लंबा नहीं खिंचना चाहिए।

सामूहिक उपवास में शामिल लोगों ने दरभंगा एम्स के निर्माण में हो रही देरी को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उनका कहना था कि यह केवल दरभंगा जिले की परियोजना नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मिथिला, कोसी और पूरे उत्तर बिहार के लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों से है। आंदोलनकारियों के मुताबिक, गंभीर बीमारियों और जटिल चिकित्सा मामलों में आज भी बड़ी संख्या में मरीजों को बेहतर इलाज के लिए पटना, दिल्ली, चंडीगढ़, कोलकाता और दूसरे बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता है। ऐसे में दरभंगा में अत्याधुनिक चिकित्सा संस्थान का निर्माण होने से क्षेत्र के लाखों लोगों को अपने आसपास ही विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं मिलने की उम्मीद है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता उमेश राय ने की, जबकि संचालन आनंद मोहन ने किया। धरना स्थल पर दिनभर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोग मौजूद रहे। वक्ताओं ने अपने संबोधन में दरभंगा एम्स को उत्तर बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण परियोजना बताते हुए इसके निर्माण की प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग की।

गांधी जयंती पर उपवास के जरिए संदेश

गांधी जयंती के अवसर पर सामूहिक उपवास का आयोजन अपने आप में एक प्रतीकात्मक संदेश भी रहा। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और जनहित के मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन को जनभागीदारी का माध्यम बनाया था। इसी संदर्भ में आंदोलनकारियों ने उपवास के माध्यम से अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की।

कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि दरभंगा एम्स का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था और आम लोगों के भविष्य से जुड़ा विषय है। उनका कहना था कि उत्तर बिहार के लोगों को उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधा के लिए लगातार दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। इलाज के साथ-साथ यात्रा, रहने और परिजनों के ठहरने का खर्च गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डालता है।

आंदोलनकारियों ने कहा कि अगर दरभंगा में प्रस्तावित एम्स पूरी क्षमता के साथ विकसित होता है तो इससे केवल मरीजों को ही लाभ नहीं मिलेगा, बल्कि मेडिकल शिक्षा, नर्सिंग शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इससे आसपास के जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।

1264 करोड़ रुपये की परियोजना, फिर भी निर्माण को लेकर सवाल

सामूहिक उपवास के दौरान वक्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से दरभंगा में एम्स की स्थापना को मंजूरी दी जा चुकी है और परियोजना के लिए 1264 करोड़ रुपये की लागत निर्धारित की गई है। इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू होने में हो रही देरी को लेकर नागरिक समाज में लगातार सवाल उठ रहे हैं।

आंदोलनकारियों का कहना था कि किसी बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान की स्थापना केवल एक भवन बनाने की प्रक्रिया नहीं होती। इसके लिए जमीन, आधारभूत संरचना, सड़क, बिजली, पानी, आवागमन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को समय रहते विकसित करना पड़ता है। निर्माण में जितनी देरी होगी, उतना ही इसका वास्तविक लाभ आम लोगों तक पहुंचने में समय लगेगा।

धरना स्थल पर वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों से निर्माण प्रक्रिया से जुड़े लंबित पहलुओं को जल्द पूरा करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकारों को आपसी समन्वय के साथ परियोजना को आगे बढ़ाना चाहिए ताकि दरभंगा एम्स की घोषणा कागजों से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।

उत्तर बिहार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है दरभंगा एम्स

दरभंगा को उत्तर बिहार के प्रमुख चिकित्सा और शैक्षणिक केंद्रों में गिना जाता है। यहां पहले से बड़ी संख्या में मरीज आसपास के जिलों से इलाज के लिए पहुंचते हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल सहित अन्य स्वास्थ्य संस्थानों पर क्षेत्र के लोगों की निर्भरता रही है। ऐसे में एक बड़े केंद्रीय स्तर के चिकित्सा संस्थान की स्थापना से क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जाती रही है।

दरभंगा एम्स को लेकर सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका क्षेत्रीय प्रभाव है। दरभंगा के अलावा मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया और आसपास के कई क्षेत्रों से मरीज इलाज के लिए दरभंगा पहुंचते हैं। प्रस्तावित एम्स के पूरी तरह विकसित होने के बाद इन जिलों के लोगों के लिए उच्चस्तरीय चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच का एक नया विकल्प तैयार हो सकता है।

सामूहिक उपवास में वक्ताओं ने इसी क्षेत्रीय महत्व को सामने रखते हुए कहा कि दरभंगा एम्स को केवल दरभंगा की परियोजना के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह उत्तर बिहार के बड़े हिस्से की चिकित्सा जरूरतों से जुड़ा संस्थान है।

750 बेड और सुपर स्पेशियलिटी सुविधाओं की उम्मीद

आंदोलनकारियों ने कार्यक्रम के दौरान प्रस्तावित एम्स की सुविधाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, संस्थान में 750 बेड की व्यवस्था, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज और सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधाएं विकसित की जानी हैं।

यदि प्रस्तावित ढांचे के अनुरूप संस्थान विकसित होता है तो गंभीर और जटिल बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को कई मामलों में बड़े शहरों की ओर जाने की आवश्यकता कम हो सकती है। हृदय रोग, कैंसर, न्यूरोलॉजी, किडनी, ट्रॉमा और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में विशेषज्ञ चिकित्सकों और अत्याधुनिक सुविधाओं की जरूरत होती है। ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर बेहतर संस्थान उपलब्ध होना मरीज और उनके परिवार दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

हालांकि किसी भी बड़े चिकित्सा संस्थान का वास्तविक प्रभाव उसके भवन और बेड की संख्या से आगे जाकर देखा जाता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, जांच सुविधाएं, आपातकालीन सेवाएं और नियमित संचालन उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए आंदोलनकारियों की मांग केवल निर्माण शुरू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि परियोजना समयबद्ध तरीके से आगे बढ़े और भविष्य में संस्थान प्रभावी ढंग से काम कर सके।

दूसरे शहरों पर निर्भरता कम करने की उम्मीद

उत्तर बिहार के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में गंभीर बीमारी का इलाज आज भी कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती है। सामान्य बीमारी का इलाज स्थानीय स्तर पर संभव होने के बावजूद जब किसी मरीज को विशेषज्ञ डॉक्टर या अत्याधुनिक जांच की आवश्यकता होती है, तब परिवारों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।

ऐसे समय में मरीज के साथ परिवार के एक या अधिक सदस्यों को भी बाहर जाना पड़ता है। यात्रा का खर्च, रहने का खर्च और लंबे इलाज के दौरान होने वाला अतिरिक्त आर्थिक बोझ परिवार की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। कई बार इलाज में देरी भी समस्या को और गंभीर बना देती है।

दरभंगा में एम्स जैसे संस्थान के विकसित होने से क्षेत्र के लोगों को ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय स्तर पर विकल्प मिलने की उम्मीद है। यही कारण है कि एम्स निर्माण की मांग को लेकर समय-समय पर नागरिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता आवाज उठाते रहे हैं।

कार्यक्रम में विभिन्न संगठनों की भागीदारी

सामूहिक उपवास कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों से जुड़े लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम को भाकपा माले के जिला सचिव बैद्यनाथ यादव, सीपीआई के जिला सचिव नारायण जी झा, सहायक जिला मंत्री राजीव कुमार चौधरी, सीपीआई (एम) के जिला सचिव मंटुन ठाकुर, दिलीप भगत, राजद नेता भोलू यादव, उदय शंकर चौधरी, रामबृक्ष यादव और सुभाष पासवान सहित कई लोगों ने संबोधित किया।

इसके अलावा लक्ष्मेश्वर सिंह उर्फ पप्पू सिंह, वसी अहमद, विश्वनाथ मिश्र, मणिकांत झा, सुधीर राय, राजू मिश्रा, हरे कृष्णा राम और मोहम्मद कलाम ने भी कार्यक्रम में अपनी बात रखी।

पूर्व प्राचार्य रमेश यादव, प्रो. सतनारायण पासवान, प्रो. रामबाबू चौपाल, प्रो. विनोद शाह, प्रो. राहत अली और कामेश्वर पासवान सहित अन्य वक्ताओं ने भी दरभंगा एम्स के निर्माण को लेकर अपनी बात रखी।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने अलग-अलग शब्दों में एक ही मांग दोहराई कि परियोजना को अब और लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि सरकार को निर्माण से संबंधित प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा करते हुए स्पष्ट समयसीमा के साथ काम आगे बढ़ाना चाहिए।

सियासत से अलग स्वास्थ्य का सवाल

दरभंगा एम्स का मुद्दा समय के साथ राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बनता रहा है, लेकिन सामूहिक उपवास में इसे मुख्य रूप से जनस्वास्थ्य के सवाल के रूप में उठाया गया। आंदोलनकारियों ने कहा कि अस्पताल बनने से राजनीतिक दलों से अधिक फायदा आम लोगों को होगा।

स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किसी भी क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा विषय माना जाता है। जब किसी इलाके में बेहतर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं विकसित होती हैं तो आसपास के क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क मजबूत होने की संभावना रहती है।

दरभंगा एम्स के निर्माण से चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी अवसर बढ़ने की उम्मीद है। मेडिकल कॉलेज और नर्सिंग कॉलेज की स्थापना होने पर विद्यार्थियों को अपने ही क्षेत्र में उच्चस्तरीय चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है। इससे आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने में मदद मिल सकती है।

अब नजर निर्माण की अगली प्रक्रिया पर

सामूहिक उपवास के बाद आंदोलनकारियों की नजर सरकार की अगली कार्रवाई पर है। कार्यक्रम के दौरान केंद्र और राज्य सरकार से निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग की गई। आंदोलनकारियों का कहना है कि लोगों को अब आश्वासन से आगे बढ़कर जमीन पर काम दिखाई देना चाहिए।

किसी भी बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट में कई प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाएं होती हैं। जमीन, निर्माण एजेंसी, डिजाइन, निविदा, आधारभूत संरचना और अन्य स्वीकृतियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्माण आगे बढ़ता है। लेकिन नागरिक समाज की अपेक्षा है कि इन प्रक्रियाओं को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए।

दरभंगा के लोगों के लिए एम्स केवल एक अस्पताल का नाम नहीं है। इसके साथ बेहतर इलाज की उम्मीद, मेडिकल शिक्षा की संभावना और क्षेत्र के स्वास्थ्य ढांचे में बड़े बदलाव की अपेक्षा जुड़ी हुई है। यही वजह है कि निर्माण में देरी का मुद्दा बार-बार सार्वजनिक मंचों पर उठता रहा है।

गांधी जयंती पर आयोजित सामूहिक उपवास ने इस मांग को फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि सरकार की ओर से निर्माण प्रक्रिया को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और प्रस्तावित परियोजना कब वास्तविक निर्माण की दिशा में आगे बढ़ती है।

दरभंगा एम्स को लेकर नागरिक समाज की मांग फिलहाल स्पष्ट है—परियोजना को गति मिले, निर्माण कार्य शीघ्र शुरू हो और उत्तर बिहार के लोगों को लंबे समय से जिस बड़े स्वास्थ्य संस्थान की उम्मीद है, वह जल्द धरातल पर दिखाई दे।

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