सहरसा: दोरमा भगवती स्थान की अनोखी कहानी, 1930 में जमीन से मिली थी मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा
Dorama Bhagwati Sthan History: पंचगछिया के दोरमा गांव में आस्था का प्रमुख केंद्र है मां भगवती का दरबार। महाष्टमी पर उमड़ते हैं श्रद्धालु।
बिहार के सहरसा जिले के ओकाही पंचायत अंतर्गत दोरमा गांव स्थित मां भगवती स्थान क्षेत्र की धार्मिक पहचान से जुड़ा हुआ है। यहां स्थापित प्राचीन प्रतिमा और उससे जुड़ी लोककथा श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखती है। दुर्गा पूजा की महाष्टमी पर बड़ी संख्या में भक्त दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
1930 में जमीन के नीचे मिली थी प्रतिमा, प्रचलित है यह कहानी
दोरमा भगवती स्थान का इतिहास (Dorama Bhagwati Temple History) स्थानीय स्तर पर प्रचलित एक रोचक घटना से जुड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1930 में पंडित सोनेलाल झा ने स्वप्न में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा देखी थी। मान्यता है कि स्वप्न में माता ने उन्हें बताया कि प्रतिमा ओकाही डीह में जमीन के नीचे दबी हुई है और उसे बाहर निकालने का निर्देश दिया।
सुबह होने पर उन्होंने अपने स्वप्न की बात लोगों को बताई। इसके बाद ग्रामीण ढोल-नगाड़ों और माता के जयकारे लगाते हुए ओकाही डीह पहुंचे। प्रतिमा मिलने की खबर फैलने के साथ ही वहां लोगों की भीड़ जुट गई।
स्थानीय विवरण के अनुसार, कुदाल से खुदाई शुरू की गई तो कुछ गहराई पर पत्थर से टकराने की आवाज सुनाई दी। इसके बाद उस स्थान पर और खुदाई की गई, जहां से पत्थर की एक भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई। प्रतिमा मिलने के बाद उसे दोरमा गांव लाया गया।
प्रचलित विवरण के मुताबिक, प्रतिमा को गांव में एक पोखर के पास स्थित विशाल पेड़ के उत्तरी हिस्से में स्थापित किया गया। इसके बाद वहां पूजा-अर्चना शुरू हुई।
चतुर्भुज महालक्ष्मी स्वरूपा मां दुर्गा की होती है पूजा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां स्थापित प्रतिमा चतुर्भुज महालक्ष्मी स्वरूपा मां दुर्गा की है। श्रद्धालु इस प्रतिमा को अपनी आस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक मानते हैं। इसे गंधार कला शैली की अद्भुत प्रतिमा भी बताया जाता है।
उपलब्ध स्थानीय जानकारी के अनुसार, पुरातत्व विभाग की टीम कई बार यहां आकर प्रतिमा का निरीक्षण कर चुकी है। प्रतिमा के ऐतिहासिक काल और पुरातात्विक पहचान के संबंध में किसी आधिकारिक निष्कर्ष का विवरण उपलब्ध नहीं है।
महाष्टमी पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
दोरमा भगवती स्थान दुर्गा पूजा (Dorama Bhagwati Sthan Durga Puja) के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। महाष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भीड़ अधिक होने के कारण व्यवस्था संभालना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, मनोकामना पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु छाग और पाड़ा की बलि चढ़ाते हैं। ग्रामीणों के दावे के मुताबिक, हर वर्ष यहां 250 से अधिक छाग और लगभग दो दर्जन पाड़ा की बलि दी जाती है।
महाष्टमी पर मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु गाजे-बाजे के साथ यहां पहुंचते हैं। धार्मिक आयोजनों के कारण दोरमा गांव में उत्सवी माहौल रहता है।
ग्रामीणों के सहयोग से बना भव्य मंदिर
वृहत्तर पंचगछिया क्षेत्र के दोरमा गांव स्थित यह भगवती स्थान स्थानीय आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। ग्रामीणों के सहयोग से यहां एक विशाल मंदिर का निर्माण किया गया है। रंग-बिरंगी रोशनी से सजा मंदिर दुर्गा पूजा के दौरान आकर्षण का केंद्र बनता है।
स्थानीय मान्यता है कि मां भगवती के दरबार में सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्त निराश नहीं लौटते। इसी विश्वास के कारण यहां श्रद्धालुओं का आना जारी रहता है।
सहरसा की धार्मिक विरासत में खास स्थान
दोरमा भगवती स्थान की पहचान पूजा-अर्चना के साथ-साथ प्रतिमा मिलने की प्रचलित कहानी और दुर्गा पूजा की परंपराओं से भी जुड़ी है। ग्रामीणों के सहयोग से बने मंदिर में महाष्टमी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थल सहरसा और पंचगछिया क्षेत्र के लोगों की धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।
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