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मिथिला पंचांग के अनुसार छठ-दिवाली 2026: जानिए तिथि, पूजा-विधि और मिथिला की परंपरा

CHANDRA TIMES | मिथिला • सहरसा • कोसी
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मिथिला पंचांग के अनुसार छठ-दिवाली 2026: जानिए तिथि, पूजा-विधि और मिथिला की परंपरा

Chhath Puja 2026 & Diwali 2026: दीपों का पर्व दीपावली और सूर्योपासना का महापर्व छठ मिथिलांचल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हैं। जानिए संभावित तिथियां, चार दिवसीय छठ पूजा का क्रम और मैथिल परंपराओं का महत्व।

मुख्य बातें
1. दीपावली की संभावित तिथि 8–9 नवंबर 2. छठ महापर्व की संभावित तिथि 15–16 नवंबर 3. नहाय-खाय और खरना से शुरू होती है चार दिवसीय परंपरा 4. संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य हैं छठ के प्रमुख अनुष्ठान 5. अंतिम तिथि स्थानीय मैथिल पंचांग से अवश्य मिलाएं

मिथिलांचल: बिहार के सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, सुपौल, पूर्णिया और आसपास के इलाकों में पर्व-त्योहारों का अपना विशेष सांस्कृतिक महत्व है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों में पंचांग, तिथि, पारिवारिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं को महत्व दिया जाता है। दीपावली और छठ महापर्व भी इसी परंपरा के महत्वपूर्ण अंग हैं।

दीपावली पर घर-आंगन दीपों से सजाए जाते हैं और मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा की जाती है। वहीं छठ महापर्व (Chhath Mahaparv) में सूर्यदेव और छठी मैया की आराधना की जाती है। यह पर्व आस्था, अनुशासन, परिवार की मंगलकामना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है।

मिथिला पंचांग के अनुसार दीपावली और छठ 2026 की तिथियां

दीपावली | Diwali 2026

8–9 नवंबर
कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या

उपलब्ध ऑनलाइन पंचांगों में दीपावली की तिथि को लेकर अंतर मिलता है। मिथिला की स्थानीय पंचांग-परंपरा के अनुसार पुष्टि करना आवश्यक है।

छठ महापर्व | Chhath Puja 2026

15–16 नवंबर
कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी-सप्तमी

उपलब्ध मैथिली पंचांग-सूचियों में 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य तथा पारण का उल्लेख मिलता है।

महत्वपूर्ण सूचना: ये उपलब्ध ऑनलाइन पंचांगों के आधार पर संभावित तिथियां हैं। अलग-अलग पंचांगों, स्थानीय तिथि-निर्णय और पूजा के नियमों के कारण अंतर हो सकता है। व्रत और पूजा से पहले अपने क्षेत्र के मान्य मैथिल पंचांग से तारीख और मुहूर्त की पुष्टि करें।

छठ महापर्व का धार्मिक महत्व | Religious Significance of Chhath

छठ पूजा को सूर्य षष्ठी और छठी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में सूर्यदेव को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का प्रतीक माना गया है। छठी मैया की आराधना परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की मंगलकामना और घर-परिवार की खुशहाली के लिए की जाती है।

मिथिलांचल में छठ पूजा की पहचान उसकी सादगी, पवित्रता और अनुशासन से है। व्रती पूजा की तैयारी से लेकर प्रसाद बनाने तक स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। परिवार के सदस्य और पड़ोसी घाट की सफाई, पूजा सामग्री जुटाने तथा अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं।

सहरसा और कोसी क्षेत्र में तालाबों, पोखरों, नदियों और अन्य जलाशयों के किनारे सामूहिक रूप से अर्घ्य देने की परंपरा देखने को मिलती है। लोकगीतों और पारंपरिक प्रसाद के बीच छठ लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।

चार दिनों तक चलती है छठ पूजा | Chhath Puja Rituals

1

नहाय-खाय | Nahay Khay

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी • संभावित तारीख: 13 नवंबर 2026

छठ पूजा के पहले दिन व्रती स्नान कर घर और रसोई की सफाई करते हैं। परंपरा के अनुसार लौकी की सब्जी, चावल और चने की दाल जैसे सात्विक भोजन तैयार किए जाते हैं। इसी दिन से छठ के नियमों का विशेष पालन शुरू होता है।

2

खरना या लोहंडा | Kharna

कार्तिक शुक्ल पंचमी • संभावित तारीख: 14 नवंबर 2026

दूसरे दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद गुड़ की खीर, रोटी और पारंपरिक प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होता है, जो उषा अर्घ्य और पारण तक चलता है।

3

संध्या अर्घ्य | Sandhya Arghya

कार्तिक शुक्ल षष्ठी • संभावित तारीख: 15 नवंबर 2026

तीसरे दिन व्रती बांस के दउरा और सूप में ठेकुआ, फल, नारियल, गन्ना और अन्य पूजन सामग्री सजाकर घाट पहुंचते हैं। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर परिवार और समाज के कल्याण की कामना की जाती है।

4

उषा अर्घ्य और पारण | Usha Arghya

कार्तिक शुक्ल सप्तमी • संभावित तारीख: 16 नवंबर 2026

अंतिम दिन सूर्योदय के समय उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद व्रती पारण करके व्रत खोलते हैं। प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और श्रद्धालुओं के बीच बांटा जाता है।

मिथिला की छठ पूजा में क्या है खास?

  • अरिपन (Aripan Art): घर के आंगन और पूजा स्थल पर चावल के घोल से पारंपरिक आकृतियां बनाई जाती हैं।
  • मैथिली छठ गीत (Maithili Chhath Songs): गीतों में सूर्यदेव, छठी मैया और परिवार की मंगलकामना से जुड़े भाव व्यक्त होते हैं।
  • ठेकुआ और कसार (Thekua Prasad): गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी से बने पारंपरिक प्रसाद छठ की विशेष पहचान हैं।
  • बांस के दउरा और सूप: फल, नारियल, गन्ना और प्रसाद को पारंपरिक बर्तनों में सजाकर घाट तक ले जाया जाता है।
  • सामूहिक सहयोग: परिवार, पड़ोस और स्थानीय समितियां घाट की सफाई और पूजा की व्यवस्था में सहयोग करती हैं।

दीपावली और छठ के बीच क्या है संबंध?

दीपावली और छठ दोनों कार्तिक मास में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्व हैं, लेकिन इनकी पूजा-पद्धति अलग है। दीपावली पर घरों में दीप जलाकर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में काली पूजा और अरिपन बनाने की परंपरा भी देखने को मिलती है।

इसके कुछ दिनों बाद छठ पर्व में सूर्यदेव को अर्घ्य देकर प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। मिथिला में दीपावली के दीपों से सजे घर-आंगन से लेकर छठ के लोकगीतों और घाटों पर होने वाली सामूहिक आराधना तक, दोनों पर्व सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान रखते हैं।

क्या 'छठ दिवाली' अलग पर्व है?
उपलब्ध जानकारी से यह प्रमाणित नहीं होता कि 'छठ दिवाली' नाम से कोई अलग पर्व या विशेष विधान पूरे मिथिलांचल में समान रूप से प्रचलित है। सामान्य पंचांग परंपरा में दीपावली और छठ पूजा अलग-अलग तिथियों पर मनाई जाती हैं। किसी गांव में इस नाम की स्थानीय परंपरा हो तो उसका विवरण अलग हो सकता है।

छठ पूजा के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

छठ पूजा में स्वच्छता और अनुशासन का विशेष महत्व है। पूजा की सामग्री और प्रसाद साफ-सुथरे स्थान पर तैयार करें। घाटों पर प्लास्टिक या अन्य कचरा न फैलाएं। नदी और तालाब में उतरते समय गहराई तथा सुरक्षा का ध्यान रखें और बच्चों व बुजुर्गों को अकेला न छोड़ें।

निर्जला व्रत कठिन हो सकता है। अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। असामान्य कमजोरी या परेशानी होने पर उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

मिथिला की आस्था और परंपरा से जुड़ा छठ महापर्व

मिथिला पंचांग की परंपरा में दीपावली और छठ दोनों पर्व आस्था, अनुशासन और सामूहिकता का संदेश देते हैं। दीपावली घर-आंगन को रोशन करती है, जबकि छठ महापर्व सूर्य, प्रकृति और परिवार के प्रति कृतज्ञता का भाव मजबूत करता है।

सहरसा और पूरे कोसी-मिथिला क्षेत्र में लोकगीतों, अरिपन, पारंपरिक प्रसाद और सामूहिक पूजा के माध्यम से इन पर्वों की सांस्कृतिक पहचान दिखाई देती है। हालांकि, पूजा की अंतिम तिथि और मुहूर्त का निर्धारण स्थानीय मान्य पंचांग के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

पंचांग संबंधी सूचना: इस लेख में दी गई तारीखें उपलब्ध ऑनलाइन पंचांग-सूचियों पर आधारित संभावित तिथियां हैं। स्थानीय मैथिल पंचांग और प्रामाणिक तिथि-निर्णय से पुष्टि करें। लेख में किसी अलग 'छठ दिवाली' विधान की पुष्टि नहीं की गई है।

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