दीपावली पर आज भी कायम है कोसी-मिथिलांचल की सदियों पुरानी उका-पाती परंपरा, सनठी जलाकर पूर्वजों को करते हैं याद
कोसी-मिथिलांचल में आज भी जीवित है सदियों पुरानी परंपरा
दीपावली का त्योहार देशभर में अलग-अलग रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। लेकिन कोसी-मिथिलांचल में इस पर्व के साथ जुड़ी उका-पाती की परंपरा इसे एक अलग सांस्कृतिक पहचान देती है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में परिवार के लोग दीपावली की रात विशेष तरीके से जूट की सूखी लकड़ी जलाते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, उका-पाती जलाने का संबंध पूर्वजों के स्मरण और उनकी आत्मा की शांति की कामना से है। इसके साथ ही परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे तथा घर से दरिद्रता दूर हो, ऐसी कामना भी की जाती है।
क्या होती है उका-पाती, कैसे की जाती है तैयार?
उका-पाती तैयार करने के लिए पटसन यानी जूट के पौधे की सूखी लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। इन सूखी लकड़ियों को स्थानीय भाषा में सनठी कहा जाता है। परिवार के लोग दीपावली से कई महीने पहले ही सनठी इकट्ठा करके रख लेते हैं, ताकि त्योहार की रात इस परंपरा को विधिवत निभाया जा सके।
- जूट यानी पटसन के पौधे की सूखी सनठियां इकट्ठा की जाती हैं।
- आमतौर पर 7 से 11 सनठियों की तीलियों का इस्तेमाल होता है।
- इन सभी तीलियों को एक साथ रखकर रस्सी से बांधा जाता है।
- इस तरह तैयार उका-पाती को दीपावली की रात जलाया जाता है।
लक्ष्मी-गणेश की पूजा के बाद निभाई जाती है उका-पाती की रस्म
परंपरा के अनुसार, दीपावली की रात मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना पूरी होने के बाद उका-पाती जलाने की रस्म शुरू होती है। परिवार के बुजुर्ग या पुरुष सदस्य पूजा में इस्तेमाल किए गए घी अथवा तेल के दीपक से उका-पाती को अग्नि प्रज्वलित करते हैं।
इसके बाद जलती हुई उका-पाती लेकर घर के विभिन्न हिस्सों और आसपास के स्थानों पर घूमा जाता है। इस दौरान पूर्वजों का स्मरण किया जाता है तथा परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें परिवार के बुजुर्गों के साथ नई पीढ़ी के लोग भी शामिल होते हैं। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लोक संस्कृति और पारिवारिक संस्कारों का हस्तांतरण होता रहता है।
धार्मिक आस्था के साथ जुड़ा है पारंपरिक पर्यावरणीय पहलू
उका-पाती की परंपरा को धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ पारंपरिक पर्यावरणीय पहलुओं से भी जोड़कर देखा जाता है। दीपावली का त्योहार वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद आता है। बारिश के दौरान घरों और आसपास नमी रहने के कारण मच्छरों तथा अन्य कीट-पतंगों की सक्रियता बढ़ सकती है।
परंपरागत रूप से माना जाता है कि सूखी सनठी जलाने से निकलने वाला धुआं मच्छरों और कीट-पतंगों को दूर रखने में मदद करता है। हालांकि, धुएं से बैक्टीरिया या रोगाणुओं के नष्ट होने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। धुएं से सांस संबंधी परेशानी और वायु प्रदूषण भी हो सकता है, इसलिए इस रस्म को निभाते समय सावधानी बरतना जरूरी है।
आधुनिक दौर में भी नई पीढ़ी निभा रही है परंपरा
बदलते समय के साथ लोगों की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। आधुनिक सुविधाओं और नई पीढ़ी की बदलती दिनचर्या के बावजूद कोसी-मिथिलांचल में उका-पाती जैसी परंपराओं का महत्व बना हुआ है।
घर के बुजुर्गों द्वारा निभाई जाने वाली इस रस्म में नई पीढ़ी की भागीदारी यह बताती है कि स्थानीय संस्कृति और परंपराएं आज भी लोगों के जीवन से जुड़ी हुई हैं। उका-पाती के माध्यम से लोग न केवल अपने पूर्वजों को याद करते हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाते हैं।
कोसी-मिथिलांचल की पहचान है लोक परंपराओं की यह विरासत
कोसी और मिथिलांचल की लोक संस्कृति में ऐसी अनेक परंपराएं मौजूद हैं, जिनका अपना धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक महत्व है। उका-पाती भी इसी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। दीपावली के अवसर पर इस रस्म का निर्वहन करना लोगों के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक विशेष माध्यम है।
सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी इस बात की गवाही देती है कि लोक संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी होती हैं। समय बदल सकता है, जीवनशैली बदल सकती है, लेकिन अपनी मिट्टी और पूर्वजों से जुड़ी परंपराएं लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखती हैं।
कोसी-मिथिलांचल की उका-पाती परंपरा केवल सनठी जलाने की एक रस्म नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, पारिवारिक जुड़ाव और लोक संस्कृति को सहेजने की सदियों पुरानी परंपरा है। दीपावली की रोशनी के बीच यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ रही है।
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