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चंद्रा टाइम्स

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Chourchan Puja 2026 : 14 सितंबर को मनाया जाएगा चौठचंद्र पर्व, तीज के साथ खास संयोग; चंद्रदेव की पूजा से जुड़ी है मिथिलांचल की समृद्ध परंपरा



मिथिलांचल का पारंपरिक चौरचन यानी चौठचंद्र पर्व इस वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इसी दिन हरितालिका तीज भी है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व चंद्रदेव की पूजा, पारिवारिक सुख-समृद्धि और पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं से जुड़ा है। सुपौल समेत कोसी और मिथिलांचल के अलग-अलग इलाकों में इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाने की तैयारी है।

चौरचन पर्व में चंद्रदेव को अर्घ्य देकर परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। पर्व की तैयारियों में घर की महिलाएं विशेष भूमिका निभाती हैं। घर की साफ-सफाई से लेकर पूजा सामग्री जुटाने और पारंपरिक पकवान बनाने तक की तैयारियां पहले से शुरू हो जाती हैं।

पूजा की थाली में खीरा, केला, नारियल और मौसमी फल के साथ मिठाइयां और घर में बनाए गए पारंपरिक व्यंजन रखे जाते हैं। कई घरों में ठेकुआ, दालपुरी, खजूर, पुरुकिया और सेव जैसे पकवान भी तैयार किए जाते हैं। दही का भी विशेष महत्व माना जाता है। लोक परंपरा में इसे शीतलता, पवित्रता और समृद्धि से जोड़ा जाता है।

चौरचन केवल पूजा तक सीमित पर्व नहीं है। घर के बुजुर्ग नई पीढ़ी को इससे जुड़ी कथा और परंपराओं के बारे में बताते हैं। बेटियां और बहुएं मिलकर पूजा की तैयारी करती हैं, जबकि बच्चे शाम में चंद्रमा के दर्शन को लेकर उत्साहित रहते हैं। इसी सामूहिकता के कारण यह पर्व परिवार के सदस्यों को एक साथ जोड़ने और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है।

इस बार चौठचंद्र और हरितालिका तीज एक ही दिन पड़ने से पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। त्रिलोकधाम गोसपुर निवासी मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, इस दिन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और रसातल में गई पृथ्वी को पुनः स्थापित किया था।

14 सितंबर को हरितालिका तीज के अवसर पर सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और संतान के उत्तम स्वास्थ्य की कामना से निर्जला व्रत रखेंगी। भगवान शिव और माता गौरी की पूजा तथा तीज व्रत कथा का श्रवण होगा। इसके बाद शाम में चौठचंद्र की पूजा की जाएगी।

शाम की पूजा के लिए घर के आंगन में अरिपन बनाया जाएगा। पूजा में पारंपरिक पकवान, फल और दही अर्पित किए जाएंगे। परिवार के सदस्य दही की माटकुरी और फल लेकर चंद्रदेव के दर्शन करेंगे तथा प्रार्थना मंत्र का पाठ कर परिवार के सुख, समृद्धि और मंगल की कामना करेंगे।

बदलती जीवनशैली के बीच भी चौरचन पर्व की ये परंपराएं मिथिलांचल की लोक संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। पूजा, पकवान, अरिपन और चंद्रदर्शन के साथ यह पर्व आज भी परिवार और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है।

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