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चंद्रा टाइम्स

चंद्रा टाइम्स

जब महात्मा गांधी पहुंचे थे सहरसा: 1934 की वह ऐतिहासिक यात्रा, पंचगछिया से चांदनी चौक तक

सहरसा के इतिहास में महात्मा गांधी का आगमन महज एक राजनीतिक यात्रा नहीं थी। यह वह दौर था जब बिहार भूकंप की भयावह त्रासदी से गुजर रहा था, देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था और कोसी क्षेत्र में भी राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना गांव-गांव तक पहुंच रही थी।

वर्ष 1934।

15 जनवरी को आए विनाशकारी भूकंप ने बिहार के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया था। इसी त्रासदी के बीच महात्मा गांधी प्रभावित इलाकों के दौरे पर निकले। इसी क्रम में गांधीजी कोसी क्षेत्र पहुंचे और पंचगछिया होते हुए सहरसा आए।

पंचगछिया में बिताए गए उनके करीब 45 मिनट आज भी स्थानीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण स्मृतियों में शामिल हैं।

यहां हुई सभा, सोने-चांदी के सिंहासन का प्रसंग, महिलाओं द्वारा आभूषण दान करने की घटना और बाद में उसी स्थान पर बने गांधी स्मारक की कहानी—सभी मिलकर पंचगछिया की गांधी यात्रा को असाधारण बना देते हैं।

नारायणी संस्कृत टोला में जुटी थी भीड़

उस समय पंचगछिया का नारायणी संस्कृत टोला सामाजिक और बौद्धिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था।

यहीं गांधीजी के स्वागत और जनसभा की तैयारी की गई थी।

सभा के आयोजन में स्वतंत्रता सेनानी अमरेंद्र नारायण सिंह उर्फ हीरा जी और रामबहादुर सिंह की प्रमुख भूमिका थी। गांधीजी के पहुंचने की खबर आसपास के गांवों तक पहुंची तो बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए पंचगछिया पहुंच गए।

गांधीजी करीब 45 मिनट तक लोगों के बीच रहे।

लेकिन उनके सामने केवल भूकंप पीड़ितों की समस्या नहीं थी।

वह जानते थे कि प्राकृतिक आपदा के बीच समाज को संगठित करना जरूरी है। राहत के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और देश की आजादी के लिए जनभागीदारी—दोनों उनके संदेश के केंद्र में थे।

पंचगछिया की वह सभा इसी दोहरे उद्देश्य की अभिव्यक्ति थी।

सोने-चांदी का सिंहासन और गांधी का इनकार

गांधीजी के स्वागत के लिए वहां एक ऐसा सिंहासन रखा गया था, जो उस समय के वैभव का प्रतीक था।

स्थानीय इतिहास में यह प्रसंग आज भी विशेष रूप से याद किया जाता है कि सोने और चांदी से बने राजदरबार के सिंहासन पर बैठने से गांधीजी ने इनकार कर दिया।

गांधी का जीवन सादगी का पर्याय था। वैभव और व्यक्तिगत सम्मान के प्रदर्शन से वे हमेशा दूरी रखते थे।

पंचगछिया में भी उनका संदेश स्पष्ट था—यदि किसी संपत्ति का उपयोग देशहित में हो सकता है, तो उसे व्यक्तिगत वैभव का प्रतीक बनाए रखने के बजाय राष्ट्र के काम में लगाया जाना चाहिए।

स्वागत के लिए रखा गया सिंहासन इसलिए गांधीजी के लिए बैठने की जगह नहीं बना। वह देशसेवा और त्याग की चर्चा का माध्यम बन गया।

यही छोटा-सा प्रसंग गांधीजी के व्यक्तित्व और उनके राजनीतिक दर्शन को समझने के लिए काफी है।

भोजन के बजाय बापू ने मांगा देश के लिए सहयोग

सभा के दौरान स्वयंसेवकों ने गांधीजी से भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया।

लेकिन गांधीजी की प्राथमिकता उस समय कुछ और थी।

उन्होंने लोगों को ऐसा सहयोग देने के लिए प्रेरित किया जिसका उपयोग देश और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए किया जा सके।

गांधीजी के भाषण का असर सभा में मौजूद लोगों पर पड़ा। बड़ी संख्या में लोग राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए।

इसका सबसे भावुक दृश्य तब सामने आया जब महिलाओं ने अपने आभूषण उतारकर गांधीजी को अर्पित करना शुरू किया।

महिलाओं ने उतार दिए अपने आभूषण

उस समय भारतीय समाज में महिलाओं के आभूषण केवल सजावट का साधन नहीं थे।

वे परिवार की संपत्ति और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते थे।

ऐसे समय में अपने गहने देश के नाम कर देना सामान्य घटना नहीं थी।

पंचगछिया की गांधी सभा में महिलाओं द्वारा बड़ी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण दान किए जाने की स्मृति आज भी स्थानीय इतिहास में जीवित है।

स्थानीय विवरणों में यह संख्या करीब आठ मन सोने और चांदी के आभूषण बताई जाती है।

इस घटना को केवल दान की रकम या वजन से नहीं समझा जा सकता।

उस दौर में महिलाओं ने जो कुछ अपने पास था, उसमें से आंदोलन के लिए देने का फैसला किया था। यह स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उस समय के समाज की भावनात्मक भागीदारी को दिखाता है।

गांधीजी के लिए ऐसे सहयोग का महत्व धन की कीमत से कहीं अधिक था।

यह लोगों की भागीदारी थी।

पंचगछिया से पैदल सहरसा की ओर

सभा समाप्त होने के बाद गांधीजी ने पंचगछिया से सहरसा की ओर यात्रा शुरू की।

स्थानीय इतिहास में उनकी इस यात्रा का उल्लेख बिहरा, सिहौल और बनगांव होते हुए बरियाही और फिर सहरसा तक पहुंचने के रूप में मिलता है।

गांधीजी के इस सफर की एक खास बात यह भी बताई जाती है कि पंचगछिया से उन्होंने काफी हिस्सा पैदल तय किया।

आज जिस दूरी को सड़क और वाहनों से कुछ समय में पूरा किया जा सकता है, उस दौर में यह यात्रा अलग तरह की थी।

गांवों के रास्ते से गुजरते हुए गांधीजी का आम लोगों के बीच पहुंचना भी उनके जनसंपर्क का हिस्सा था।

उनकी राजनीति मंचों और सभागारों तक सीमित नहीं थी। वे लोगों के बीच जाकर बात करने में विश्वास रखते थे।

सहरसा के चांदनी चौक में रात का विश्राम

सहरसा पहुंचने के बाद गांधीजी को तत्कालीन प्रशासन की ओर से चांदनी चौक स्थित सरकारी बंगले में रात्रि विश्राम कराया गया।

यही स्थान आज गांधीजी के सहरसा प्रवास की प्रमुख स्मृतियों में गिना जाता है।

उस समय सहरसा शहर छोटा था। आधुनिक सुविधाओं और आज के विस्तृत शहरी ढांचे की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

ऐसे समय में गांधीजी का यहां रुकना शहर के लिए असाधारण घटना थी।

स्थानीय लोग उनसे मिलने पहुंचे। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत हुई और देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई।



2 अप्रैल 1934 को सहरसा से जारी हुआ गांधीजी का बयान

गांधीजी की सहरसा यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू अगले दिन सामने आया।

2 अप्रैल 1934 को गांधीजी ने सहरसा से प्रेस के लिए अपना महत्वपूर्ण वक्तव्य जारी किया।

यह तथ्य सहरसा को गांधीजी के राजनीतिक इतिहास से सीधे जोड़ता है।

गांधीजी ने उस समय सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक परिस्थितियों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।

इस लिहाज से सहरसा गांधीजी की यात्रा का केवल एक पड़ाव नहीं था।

यह वह स्थान भी बना जहां से उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक सवाल पर सार्वजनिक वक्तव्य दिया।

गांधी के जाने के बाद भी पंचगछिया में जारी रहा आंदोलन

गांधीजी पंचगछिया से चले गए, लेकिन उनकी यात्रा का असर वहीं समाप्त नहीं हुआ।

नारायणी संस्कृत टोला का छात्रावास धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बनने लगा।

बिहार और कोसी क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानियों का यहां आना-जाना हुआ।

अमरेंद्र नारायण सिंह उर्फ हीरा जी और रामबहादुर सिंह जैसे लोगों ने क्षेत्र में आंदोलन को आगे बढ़ाया।

समय के साथ रामबहादुर सिंह की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण हुई कि उन्हें सम्मानपूर्वक “कोसी का गांधी” कहा जाने लगा।

संस्कृत टोला विद्यालय के पास जनसहयोग से सोशल क्लब की स्थापना भी हुई। यह स्थान आगे चलकर सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना।

यानी गांधीजी की 45 मिनट की सभा का प्रभाव केवल उन 45 मिनटों तक सीमित नहीं रहा।

उसने एक जगह को आंदोलन की स्मृति और गतिविधियों से जोड़ दिया।

गांधीजी की हत्या के बाद बना स्मारक

30 जनवरी 1948।

देश को वह खबर मिली जिसने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया।

महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी।

पंचगछिया में भी इसका गहरा असर हुआ।

स्थानीय युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने तय किया कि जिस जगह गांधीजी ने खड़े होकर लोगों को संबोधित किया था, उसी स्थान पर उनकी स्मृति को स्थायी रूप दिया जाएगा।

पंचगछिया ड्योढ़ी के नृपेंद्र नारायण सिंह उर्फ पन्ना जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों ने इस दिशा में पहल की।

सरयुग सिंह, ब्रह्मचारी सिंह, लक्ष्मणलाल दास, जगरनाथ ठाकुर, राजेंद्रलाल दास, गुणानंद पाठक और रतिलाल मिश्र समेत कई लोगों की सहभागिता रही।

गांधीजी के श्राद्ध कर्म के दिन स्मारक का शिलान्यास कराया गया।

दलित समाज के लालजी डोम से कराया गया शिलान्यास

इस स्मारक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष भी यहीं सामने आता है।

गांधीजी जीवनभर सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे।

इसी विचार को स्मारक के निर्माण से भी जोड़ा गया।

शिलान्यास के लिए दलित समाज के लालजी डोम को चुना गया।

गांधी की स्मृति में बनने वाले स्मारक की नींव एक दलित व्यक्ति के हाथों रखवाना अपने आप में सामाजिक बराबरी का संदेश था।

इसमें गांधीजी के हरिजन उत्थान और सामाजिक समरसता के विचार की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।

1948 में स्थापित गांधी प्रतिमा आज भी मौजूद

जनसहयोग से स्थापित गांधीजी की प्रतिमा आज भी सोशल क्लब पंचगछिया में मौजूद है।

लेकिन समय के साथ इस ऐतिहासिक स्थल की चमक फीकी पड़ती गई।

जिस स्थान पर कभी हजारों लोग गांधीजी को सुनने पहुंचे थे, जहां महिलाओं ने अपने आभूषण तक देश के लिए अर्पित किए थे और जहां स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता जुटते थे, वही स्थान आज संरक्षण की प्रतीक्षा में है।

गांधी जयंती जैसे अवसरों पर वहां कार्यक्रम जरूर होते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह चिंता बनी हुई है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को जिस स्तर पर संरक्षित किया जाना चाहिए, वह नहीं हो पाया है।

सवाल प्रतिमा का नहीं, इतिहास के संरक्षण का है

पंचगछिया में गांधीजी की प्रतिमा खड़ी होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

जरूरत उस पूरी कहानी को सुरक्षित रखने की है जो इस प्रतिमा के पीछे मौजूद है।

वह 45 मिनट की सभा।

अमरेंद्र नारायण सिंह उर्फ हीरा जी और रामबहादुर सिंह की भूमिका।

सोने-चांदी के सिंहासन को लेकर गांधीजी का रुख।

भोजन के बजाय देश के लिए सहयोग का आह्वान।

महिलाओं द्वारा आभूषणों का दान।

पंचगछिया से सहरसा तक की यात्रा।

चांदनी चौक के सरकारी बंगले में गांधीजी का विश्राम।

और फिर 2 अप्रैल 1934 को सहरसा से जारी उनका प्रेस वक्तव्य।

यह पूरी कहानी मिलकर सहरसा और कोसी क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनाती है।

पंचगछिया का गांधी स्मारक सिर्फ एक प्रतिमा नहीं

इतिहास को केवल पत्थर और धातु की प्रतिमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।

इतिहास तब जीवित रहता है जब उसके पीछे की कहानी अगली पीढ़ी तक पहुंचती है।

पंचगछिया में गांधीजी का स्मारक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय की गवाही देता है जब कोसी क्षेत्र के आम लोग राष्ट्रीय आंदोलन से सीधे जुड़ रहे थे।

इस स्थल को विकसित कर गांधीजी की पंचगछिया यात्रा से जुड़े दस्तावेज, स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास, 1934 के भूकंप की जानकारी और उस दौर की तस्वीरें प्रदर्शित की जा सकती हैं।

स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों को यहां लाकर उन्हें स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी बताई जा सकती है।

तभी यह स्मारक एक प्रतिमा से आगे बढ़कर इतिहास का जीवंत केंद्र बन सकेगा।

जिस जगह बापू खड़े हुए थे, वहां आज भी इतिहास खड़ा है

पंचगछिया की उस धरती पर गांधीजी करीब 45 मिनट रहे थे।

समय के हिसाब से यह बहुत लंबा वक्त नहीं था।

लेकिन इतिहास में किसी घटना का महत्व उसकी अवधि से नहीं, उसके प्रभाव से तय होता है।

उन 45 मिनटों में भूकंप पीड़ित बिहार की चिंता थी।

स्वतंत्रता आंदोलन की पुकार थी।

समाज को जोड़ने का संदेश था।

महिलाओं का त्याग था।

स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष था।

और एक ऐसा विचार था जिसमें व्यक्तिगत वैभव से ज्यादा राष्ट्रसेवा का महत्व था।

आज जब पंचगछिया के उसी ऐतिहासिक स्थल की ओर नजर जाती है, तो वहां खड़ी गांधीजी की प्रतिमा केवल एक व्यक्ति की याद नहीं दिलाती।

वह उस दौर की याद दिलाती है जब कोसी की धरती ने भी आजादी की लड़ाई में अपनी आवाज बुलंद की थी।

और शायद इसीलिए पंचगछिया की गांधी यात्रा को याद करना सिर्फ अतीत को याद करना नहीं है।

यह सहरसा से जुड़ी उस विरासत को पहचानना है, जिसके केंद्र में एक दिन महात्मा गांधी स्वयं खड़े थे।

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