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चंद्रा टाइम्स

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Saharsa : ठंड की रात, सहरसा जंक्शन और मजबूरी का सच



ठंड की उस स्याह रात में सहरसा जंक्शन सिर्फ एक स्टेशन नहीं था, वह मजबूरी की खुली किताब बन चुका था। अगर कोई इंसान रात के 12 बजे के बाद वहां कुछ देर बैठ जाए और खामोशी से लोगों के चेहरे पढ़े, तो उसे समझ में आ जाएगा कि पलायन कोई शौक नहीं, बल्कि हालात की दी हुई सज़ा है। यह खबर लिखते हुए सच कहूं तो हाथ कांप रहे हैं, क्योंकि जिस दर्द को शब्दों में उतारने की कोशिश कर रहा हूं, वह कागज पर उतरते ही और भारी हो जाता है।

बीती देर रात सहरसा जंक्शन पहुंचा तो प्लेटफॉर्म पर ठंड से कांपते कुछ चेहरे दिखे। नाम पूछने पर अनिल यादव, सचिन कुमार यादव, सज्जन यादव, रूपेश यादव, जद्दू साह, मिथलेश यादव, पपलू सादा, दिलचन सादा, सत्यम सादा और भोली शर्मा सामने आए। सभी की आंखों में एक जैसी थकान थी, एक जैसा डर और एक जैसी मजबूरी। ठंड इतनी कि दांत बज रहे थे, लेकिन उससे ज्यादा कंपकंपी भविष्य की चिंता से थी।

उन्होंने बताया कि वे सभी महाराष्ट्र जा रहे हैं। काम कोई बड़ा नहीं, कोई ऊंचा पद नहीं—बोरा धोने का काम। बात करते-करते किसी ने धीरे से कहा, “अगर सरकार यहीं रोज़गार की व्यवस्था कर दे तो दस हजार की नौकरी के लिए परदेश क्यों जाएंगे?” यह सवाल नहीं था, यह एक टूटे हुए दिल की सिसकती हुई फरियाद थी।

इन लोगों के पास न तो बड़े सपने थे, न बड़ी मांगें। बस इतना चाहते थे कि अपने गांव, अपने घर, अपने माता-पिता और बच्चों से दूर न जाना पड़े। लेकिन पेट की आग और जिम्मेदारियों का बोझ इंसान को वहां ले जाता है, जहां वह कभी जाना नहीं चाहता। ठंड की उस रात प्लेटफॉर्म पर खड़े ये लोग अपने गांव को पीछे छोड़ रहे थे, सिर्फ इसलिए क्योंकि बिहार में उनके लिए काम नहीं था।

सिर्फ सरकार को दोष देना भी शायद पूरी सच्चाई नहीं है, क्योंकि हर घर में सरकारी नौकरी देना संभव नहीं। लेकिन यह भी सच है कि अगर बिहार में नए-नए उद्योग आते, अगर स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर पैदा होते, तो शायद सहरसा जंक्शन की रातें इतनी खामोश और इतनी दर्दनाक नहीं होतीं। उद्योगों के नाम पर बातें बहुत हुईं, लेकिन जमीन पर उतनी तस्वीर नहीं बदली।

सहरसा जंक्शन की उस रात ने यह साफ कर दिया कि पलायन आंकड़ों की कहानी नहीं है, यह ठंड से कांपते हाथों, भीगी आंखों और भारी दिलों की कहानी है। जब तक बिहार में रोज़गार के ठोस अवसर नहीं बनेंगे, तब तक हर साल, हर मौसम में ऐसे ही लोग अपने सपनों और अपनों को पीछे छोड़कर मजबूरी की ट्रेन पकड़ते रहेंगे।

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