सहरसा से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां 11 साल से फरार चल रहे प्रयाग इन्फ्राटेक के चेयरमैन बासुदेव बागची आखिरकार पुलिस के हत्थे चढ़ गए हैं। कोलकाता से गिरफ्तारी के बाद उन्हें सहरसा लाया गया और कोर्ट में पेशी के बाद न्यायिक हिरासत में सहरसा जेल भेज दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद उन सैकड़ों निवेशकों में उम्मीद जगी है, जिनकी मेहनत की कमाई सालों से फंसी हुई है।
दरअसल, प्रयाग इन्फ्राटेक पर लोगों को रकम दोगुनी करने समेत कई आकर्षक योजनाओं का लालच देकर निवेश कराने और बाद में पैसा वापस नहीं करने का आरोप है। इस मामले में वर्ष 2015 में सदर थाना में केस दर्ज हुआ था।
पटुआहा निवासी विकास चंद्र मिश्र की शिकायत के मुताबिक, उन्होंने अपनी पत्नी राखी मिश्रा के साथ मिलकर कंपनी में कुल 7 लाख 56 हजार रुपये निवेश किए थे। आरोप है कि तय समय पूरा होने के बाद भी कंपनी ने रकम वापस नहीं की। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा।
सहरसा शहर के गांधी पथ से कंपनी का कार्यालय भी संचालित होता था। आरोप है कि कंपनी के एजेंटों और अधिकारियों ने बड़ी संख्या में लोगों से निवेश कराया और सैकड़ों निवेशकों से करोड़ों रुपये जमा होने के बाद कार्यालय बंद हो गया। इसके बाद कंपनी से जुड़े कई जिम्मेदार लोग फरार हो गए।
सबसे खास बात ये है कि इस मामले में नामजद बासुदेव बागची करीब 11 साल तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। अब कोलकाता में चल रहे एक दूसरे मामले में उनकी जमानत रद्द होने के बाद सहरसा पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी कर प्रोडक्शन वारंट हासिल किया और कोलकाता पुलिस के सहयोग से उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
बताया जा रहा है कि प्रयाग इन्फ्राटेक के खिलाफ बिहार के कई जिलों में ठगी से जुड़े मामले दर्ज हैं। बासुदेव बागची के अलावा उनके पुत्र और कंपनी के प्रबंध निदेशक लक्ष्मीकांत मिश्रा के खिलाफ भी अलग-अलग एजेंसियों में कार्रवाई की बात सामने आती रही है। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के जरिए ही होगी।
अब इस पूरे मामले में आर्थिक अपराध इकाई यानी EOU की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर कोर्ट से रिमांड की अनुमति मिलती है, तो बासुदेव बागची से पूछताछ की जाएगी। जांच में सबसे बड़ा सवाल होगा—निवेशकों से कुल कितनी रकम जुटायी गयी, पैसा आखिर गया कहां और इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे?
फिलहाल बासुदेव बागची सहरसा जेल में हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद 11 साल पुराने इस मामले की फाइल एक बार फिर खुल गई है। अब निवेशकों की नजर जांच पर टिकी है कि उनकी फंसी हुई मेहनत की कमाई का क्या होगा और इस पूरे चिटफंड नेटवर्क का असली सच कब सामने आएगा।

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