हरिदर्शन सेवा संस्थान फाउंडेशन ट्रस्ट, सहरसा के संस्थापक डॉ. नवनीत ने पितृपक्ष को लेकर जानकारी देते हुए बताया कि पितरों को प्रसन्न करने के लिए आश्विन कृष्ण पक्ष की विशेष तिथियों में श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण का विधान बताया गया है। इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हो रही है।
डॉ. नवनीत ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति की कामना की जाती है। लोक मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितर अपने परिवारजनों से मिलने धरती लोक पर आते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए निर्धारित तिथि पर श्राद्ध कर्म करते हैं।
उन्होंने बताया कि शास्त्रीय परंपरा के अनुसार जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करने से मृत आत्मा की शांति और पितरों की कृपा की कामना की जाती है।
वहीं, जिन लोगों को अपने पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, वे पितृपक्ष की अमावस्या तिथि पर श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं। डॉ. नवनीत के अनुसार पंचांग के मुताबिक इस वर्ष अमावस्या तिथि 10 अक्टूबर को है। इसी दिन अज्ञात तिथि वाले पितरों के लिए श्राद्ध और पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाएगी।
पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों का स्मरण कर तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। यह अवधि भारतीय धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने के अवसर के रूप में देखी जाती है।
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