80-90 के दशक का बचपन आज की तरह मोबाइल, इंटरनेट और रंग-बिरंगे डिजिटल ऐप्स से घिरा नहीं था। उस दौर में बच्चे जब पहली बार किताब पकड़ते थे, तो कई घरों में उनके हाथ में आने वाली किताब का नाम होता था—‘मनोहर पोथी’। यह सिर्फ एक किताब नहीं थी, बल्कि उस समय अनगिनत बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत से जुड़ी एक ऐसी याद थी, जिसे आज भी उस पीढ़ी के लोग आसानी से भूल नहीं पाते।
अक्सर माता-पिता अपने छोटे बच्चों को स्कूल भेजने से पहले ही मनोहर पोथी से पढ़ाई की शुरुआत करवाते थे। घर में बच्चे के लिए पहली किताब आने का मतलब ही कई बार मनोहर पोथी हुआ करता था। अक्षरों से पहचान, शब्दों को पढ़ने की कोशिश और धीरे-धीरे किताब के पन्नों से दोस्ती—कई बच्चों की शुरुआती शिक्षा इसी तरह आगे बढ़ती थी।
अक्षर पहचानने से पढ़ना सीखने तक
मनोहर पोथी की खासियत इसकी शुरुआती शिक्षा से जुड़ी सरल पद्धति मानी जाती है। इसमें बच्चों को देवनागरी अक्षरों से परिचित कराने के साथ शब्द और छोटे वाक्यों के माध्यम से पढ़ने का अभ्यास कराया जाता था। शुरुआती स्तर पर बच्चों के लिए गिनती और पहाड़े जैसी बुनियादी चीजें भी सीखने की सामग्री का हिस्सा रही हैं।
यही वजह थी कि यह किताब केवल अक्षर पहचानने की किताब बनकर नहीं रह गई। बच्चों के लिए यह पढ़ाई की उस दुनिया का पहला दरवाजा थी, जहां वे धीरे-धीरे अक्षरों को जोड़कर शब्द और शब्दों को जोड़कर वाक्य समझना शुरू करते थे।
माता-पिता के लिए भी खास थी मनोहर पोथी
उस दौर में बच्चे की पढ़ाई की शुरुआत केवल स्कूल की जिम्मेदारी नहीं मानी जाती थी। घर में माता-पिता या परिवार के बड़े बच्चे को बैठाकर अक्षर और शब्द पढ़ाते थे। ऐसे में मनोहर पोथी घर और बच्चे की शुरुआती पढ़ाई के बीच एक महत्वपूर्ण माध्यम बन जाती थी।
कई परिवारों के लिए बच्चे के हाथ में इस किताब का होना इस बात का संकेत था कि अब उसकी पढ़ाई शुरू हो गई है। किताब के पन्ने पलटते हुए बच्चे का अक्षरों को पहचानना और उन्हें बोलने की कोशिश करना माता-पिता के लिए भी खुशी का क्षण होता था।
बिहार से जुड़ा रहा गहरा रिश्ता
मनोहर पोथी का संबंध बिहार की पुरानी हिंदी शिक्षा परंपरा से भी जोड़ा जाता है। उपलब्ध साहित्यिक सामग्री में आचार्य रामलोचन शरण का नाम मनोहर पोथी के साथ प्रमुख रूप से मिलता है। रामलोचन शरण शिक्षक, साहित्यकार, व्याकरणकार, संपादक और प्रकाशक के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने बच्चों की शिक्षा के लिए सरल और उपयोगी पुस्तकों को तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया था।
रामलोचन शरण ने 1915 में लहेरियासराय में पुस्तक भंडार की स्थापना की थी। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चों के लिए ऐसी किताबें तैयार करना था, जिनकी भाषा सरल हो और जिन्हें बच्चे सहजता से समझ सकें।
हालांकि मनोहर पोथी के रचयिता को लेकर उपलब्ध इंटरनेट सामग्री में एकरूपता नहीं है। कुछ हालिया स्रोत हवलदारी राम गुप्त को इसका रचयिता बताते हैं, जबकि अन्य साहित्यिक स्रोत इसे आचार्य रामलोचन शरण से जोड़ते हैं। इसलिए लेखक के संबंध में अंतिम निष्कर्ष के लिए पुस्तक के मूल संस्करण और प्रकाशकीय अभिलेखों की पुष्टि जरूरी है।
बिहार से बाहर भी पहुंची मनोहर पोथी
मनोहर पोथी की चर्चा केवल बिहार तक सीमित नहीं रही। नेपाल के लेखक कुमार नगरकोटी ने अपने एक संस्मरण में बताया है कि उन्होंने चार वर्ष की उम्र में हिंदी की किताब ‘Manohar Pothi’ से पढ़ना शुरू किया था। उनके गांव में उस समय नेपाली भाषा की किताबें उपलब्ध नहीं थीं।
इस तरह मनोहर पोथी की कहानी केवल एक किताब की कहानी नहीं है। यह उस दौर की प्राथमिक शिक्षा और हिंदी पढ़ने की एक ऐसी परंपरा से जुड़ी है, जिसने अलग-अलग जगहों पर बच्चों की शुरुआती सीखने की यात्रा में जगह बनाई।
आज किताब से ज्यादा एक याद है
आज बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन हैं, पढ़ाई के लिए मोबाइल ऐप हैं और अक्षर सीखने के लिए वीडियो उपलब्ध हैं। लेकिन 80-90 के दशक में बचपन बिताने वाली पीढ़ी के लिए मनोहर पोथी का अर्थ कुछ अलग है।
किसी को इस किताब के पन्ने याद हैं, किसी को घर में बैठकर अक्षर पढ़ाने वाले माता-पिता, तो किसी को वह समय जब पढ़ाई की शुरुआत के साथ ही किताब से लगाव पैदा होना शुरू हुआ था।
शायद यही कारण है कि मनोहर पोथी को 80-90 के दशक के बच्चों की किताबों की ‘बादशाह’ कहे जाने की याद आज भी लोगों के बीच जीवित है। वह दौर बदल गया, पढ़ने के तरीके बदल गए और किताबों की जगह भी काफी हद तक बदल गई, लेकिन कई लोगों के लिए पढ़ाई की पहली सीढ़ी के रूप में मनोहर पोथी आज भी बचपन की एक बेहद खास याद बनी हुई है।

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