शिव चंद्र झा : एक समय था जब गांव की पहचान उसकी मिट्टी की खुशबू, चौपाल की चहल-पहल और लोगों के बीच आत्मीयता से होती थी। सुबह होते ही गांव की गलियों में जीवन की एक अलग ही रौनक दिखाई देती थी। कोई खेत की ओर बैल लेकर निकल पड़ता था, तो कोई कुएं पर पानी भरते हुए अपने सुख-दुख की बातें साझा करता था। गांव की सड़कें केवल रास्ते नहीं होती थीं, बल्कि रिश्तों और अपनत्व की डोर को जोड़ने वाली जगहें होती थीं।
पहले अक्सर गांव की सड़क किनारे लोग बैठे मिल जाते थे। कहीं ताश का खेल चलता था, तो कहीं खेती-बाड़ी की चर्चा होती थी। कोई अपनी फसल की कहानी सुनाता था, तो कोई अपनी गाय और बैलों की तारीफ करते नहीं थकता था। बुजुर्ग पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर गांव के पुराने किस्से सुनाते थे और बच्चे उनके आसपास खेलते नजर आते थे। शाम होते ही चौपाल सज जाती थी, जहां बिना किसी स्वार्थ के लोग घंटों एक-दूसरे के साथ समय बिताते थे। उस दौर में लोगों के पास शायद सुविधाएं कम थीं, लेकिन दिलों में अपनापन और चेहरों पर सुकून ज्यादा था।
गांव की जिंदगी में रिश्तों की गर्माहट साफ दिखाई देती थी। अगर किसी के घर कोई परेशानी आ जाए, तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो जाता था। किसी के यहां शादी हो तो पूरा टोला परिवार बन जाता था। खेतों में काम करते समय लोग एक-दूसरे की मदद करते थे। त्योहार केवल एक रस्म नहीं होते थे, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का सबसे बड़ा माध्यम होते थे। गांव की असली ताकत उसकी सामूहिकता और भाईचारा था।
लेकिन समय के साथ गांवों की तस्वीर तेजी से बदलने लगी। शिक्षा, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जाने लगे। जो कभी गांव की गलियों में दिनभर दिखाई देते थे, वे अब महानगरों की भीड़ में अपनी जिंदगी तलाश रहे हैं। गांव अब केवल त्योहारों, शादी-विवाह या किसी पारिवारिक कार्यक्रम के समय ही आबाद नजर आते हैं। बाकी दिनों में गांव की गलियां सूनी और चौपालें वीरान दिखाई देती हैं।
आज अगर गांव में कहीं लोग मिल भी जाएं, तो पहले जैसी बातचीत कम ही देखने को मिलती है। अब लोग आमने-सामने बैठकर हालचाल पूछने के बजाय अपने मोबाइल फोन में व्यस्त नजर आते हैं। कोई रील देख रहा होता है, तो कोई वीडियो स्क्रॉल करने में डूबा रहता है। भले सामने बैठा व्यक्ति बातचीत करने का इच्छुक हो, लेकिन आंखें मोबाइल स्क्रीन से हटती ही नहीं। ऐसा लगता है मानो इंसान धीरे-धीरे इंसानों से दूर और मशीनों के करीब होता जा रहा है।
मोबाइल फोन और इंटरनेट ने जहां दुनिया को जोड़ने का काम किया है, वहीं कहीं न कहीं लोगों के बीच की दूरी भी बढ़ा दी है। पहले गांव में लोग शाम को मिलकर हंसी-मजाक करते थे, लेकिन अब हर व्यक्ति अपने-अपने डिजिटल संसार में कैद होता जा रहा है। बच्चे अब मैदान में कम और मोबाइल गेम्स में ज्यादा दिखाई देते हैं। बुजुर्गों के पास कहानियां तो आज भी हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला समय अब किसी के पास नहीं बचा।
तकनीक का विकास गलत नहीं है, लेकिन जब यही तकनीक इंसानी रिश्तों पर भारी पड़ने लगे, तब चिंता होना स्वाभाविक है। गांव, जो कभी सामाजिक एकता और आत्मीयता की मिसाल हुआ करते थे, वहां अब अकेलापन धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। लोग एक ही घर में रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी हम अपनी जड़ों और सामाजिक मूल्यों को न भूलें। मोबाइल का उपयोग जरूरी है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। गांव की चौपालें फिर से आबाद हों, लोग फिर से एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल हों और बच्चों की आवाजें फिर से गलियों में गूंजें — यही गांव की असली पहचान है।
क्योंकि गांव केवल मकानों का समूह नहीं होता, गांव भावनाओं, रिश्तों और सामूहिक जीवन का नाम होता है। अगर यह अपनापन खत्म हो गया, तो गांव की आत्मा भी कहीं खो जाएगी।
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